कोरोना से जिंदगी की जंग हार गये फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह, चंडीगढ़ के PGI में ली अंतिम सांस

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फ्लाइंग सिख के नाम से मशहुर भारत के महान धावक मिल्खा सिंह कल देर रात इस दुनिया को अलविदा कह दिया। चंडीगढ़ के PGI अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। 91 वर्षीय मिल्खा सिंह को कोरोना हो गया था। हालांकि गुरुवार को उनकी रिपोर्ट निगेटिव आई थी लेकिन कल उनकी हालत नाजुक हो गई थी। मिल्खा सिंह के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, खेल मंत्री किरण रिजुजु, पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित कई राजनेता और खेल जगत की हस्तियों ने दुख जताया है।

मिल्खा सिंह का जन्म 20 नवंबर 1929 को गोविंदपुरा (जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है) के एक सिख परिवार में हुआ था। मिल्खा सिंह का बचपन बहुत कठिनाइयों से गुजरा और भारत के विभाजन के बाद हुए दंगों में मिल्खा सिंह ने अपने माता-पिता और कई भाई-बहनों को खो दिया था। मिल्खा सिंह को बचपन से दौड़ने का शौक था। मिल्खा को खेल और देश से बहुत लगाव था, इस वजह से विभाजन के बाद भारत भाग आए और भारतीय सेना में शामिल हुए थे। मिल्खा सिंह भारत के खेल इतिहास के सबसे सफल एथलीट थे। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति फील्ड मार्शल अयूब खान तक सब मिल्खा सिंह के हुनर के मुरीद थे। उन्होंने ही मिल्खा सिंह को फ्लाइंग सिख की उपाधि दी थी।

भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया
1956 में मेलबर्न में आयोजित ओलिंपिक खेल में भाग लिया। कुछ खास नहीं कर पाए, लेकिन आगे की स्पर्धाओं के रास्ते खोल दिए। 1958 में कटक में आयोजित नेशनल गेम्स में 200 और 400 मीटर में कई रिकॉर्ड बनाए। इसी साल टोक्यो में आयोजित एशियाई खेलों में 200 मीटर, 400 मीटर की स्पर्धाओं और राष्ट्रमंडल में 400 मीटर की रेस में स्वर्ण पदक जीते। उनकी सफलता को देखते हुए भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। इतना ही नहीं मैडम तुसाद म्यूजियम में भी उड़न सिख को जगह मिली है। यहां दुनियाभर की हस्तियों के साथ मिल्खा सिंह का भी मोम का पुतला लगा है।

चंडीगढ़ में शनिवार शाम जब उनकी अंतिम यात्रा शुरू हुई तो पूरा चंडीगढ़ अपने हीरो को सलामी देने उमड़ पड़ा। जीवन में हर कठिनाई को पार कर मिल्खा सिंह ने वो पहचान बनाई कि दुनिया उनकी मुरीद बन गई। कोरोना जैसी नामुराद बीमारी ने उनका जीवन बेशक छीन लिया लेकिन वे लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे।

अजय झा

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