दलित वोटों के लिए राजनैतिक दलों के बीच लगती होड़

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दलित यानी अनुसूचित जाति के लिए प्रचलित शब्द का मतलब देश की 25 फीसदी आबादी है। आजादी के सात दशक बाद भी देश में तीन-चौथाई से ज्यादा अनुसूचित जाति के लोग गांवों में बसते हैं जिनमें 84 फीसदी की औसत मासिक आय 5,000 रु. से कम है। यहां तक कि संविधान से उन्हें मिली आरक्षण रूपी सुरक्षा को भी अपेक्षाकृत ज्यादा दबंग पिछड़ों यानी ओबीसी ने मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद हाइजैक कर लिया है। इसी के साथ हकीकत यह भी है कि एक राजनैतिक समूह के खासकर बिहार में चुनावों को प्रभावित करने की दलितों की क्षमता की वजह से हर राजनैतिक दल उन पर डोरे डालने की फिराक में रहता है। अक्सर आपने देखा होगा की सभी राजनैतिक दलों के बड़े नेता दलित, महादलित के घर पे जा कर जमींन पर बैठकर खाना खाते हैं,वोट बैंक के लिए ऐसी तस्वीर खिंचवाने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते। लेकिन बात जब उनको मुख्य धरा में लाने की होती है। उनके जीवनस्तर में बदालव की बात होती है। उनके शिक्षा और रोजगार की बात होती है तो सभी दलों के नेता मौन धारण कर लेते हैं। बता दें कि दलितों का उत्पीडऩ किसी एक पार्टी की पहचान नहीं है। इस जातिगत टकराव को बढ़ाने वाली एक वजह इस समुदाय का अधिकतर राजनैतिक दलों के साथ हो रहा मोहभंग है जो उसे महज इस्तेमाल कर भुला देने की चीज मानते रहे हैं।

हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (से) के प्रदेश उपाध्यक्ष रंजीत कुमार चंद्रवंशी ने कहा कि सभी राजनैतिक दल इन चीजों को समस्या के रूप में नहीं देखते। वे दलितों के बीच गरीबी को एक मुद्दे की तरह जिंदा रखना चाहते हैं ताकि चुनावी लाभ के लिए उसका दोहन करते रह सकें। वोटों के लिए दलित नाम की माला तो सारी राजनैतिक पार्टियां जप रही हैं। लेकिन इसके बावजूद जब दलित अपने अधिकारों की मांग करते हैं तो उन्हें अगड़ी जातियों की दबंगई से कुचला जाता है। उन्होंने बताया कि बिहार में 80 फीसदी से अधिका आवादी एससी,एसटी,ओबीसी और मॉइनॉरिटी की है। अगर ये सभी एक साथ आ जाय तो किसी भी राजनैतिक दलों की दाल नहीं गलेगी। इनकी एक जुटता ही विकास की राह की नई इबारत लिखेगी। बताते चलें कि रंजीत कुमार चंद्रवंशी ने 2 दिसंबर 2018 को पटना के ऐतिहासिक गाँधी मैदान में एससी,एसटी के लिए महारैला किया था। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बिहार के कृषिमंत्री डॉ प्रेम कुमार थे। समय समय पर पिछड़ों अति पिछड़ों की आवाज़ बनकर उनके मुद्दों को उठाते रहते हैं।

अजय झा

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