माउंटेन मैन दशरथ मांझी की पुण्यतिथि

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माउंटेन मैन दशरथ मांझी का आज 12 वीं पुण्यतिथि है।दशरथ मांझी, एक ऐसा नाम जो इंसानी जज्‍़बे और जुनून की मिसाल है। वो दीवानगी, जो प्रेम की खातिर ज़िद में बदली और तब तक चैन से नहीं बैठा, जब तक कि पहाड़ का सीना न चीर दिया। माउंटेन मैन के याद में पुरे बिहार सहित जमुई के सगुन वाटिका हॉल में महिला अधिकार मोर्चा द्वारा दशरथ मांझी का पुण्यतिथि मनाया गया। वही इस अवसर पर वीर विद्वान शक्तिमान सम्मलेन का आयोजन किया गया। इस मौके पर बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर, दशरथ मांझी, भोला मांझी को याद किया गया।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्व सांसद ब्रम्हदेव आनंद पासवान ने कहा कि जब तक बिहार में दलित अति पिछड़ा, मुसलमान कोई मुख्यमंत्री नहीं होगा तब तक बंचित समाज का विकास नहीं होगा। वहीँ महिला अधिकार मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनामिका पासवान ने कहा कि बाबा दशरथ मांझी देश के पहले ऐसे शख्स हैं जिन्होंने नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया। उन्होंने माउंटेन मैन दशरथ मांझी को राष्ट्रपति से भारत रत्न देने की मांग की। अनामिका ने वेलेंटाइन डे पर दशरथ मांझी डे मानाने पर जोर दिया। मोर्चा के महामंत्री सुजाता सिंह ने कहा कि आज यदि दशरथ मांझी होते तो कोई ऐसा पहाड़ नहीं जिसको इनका डर नहीं रहता।

यूँ तो वेलेंटाइन डे प्यार करने वाले लोगों का दिन है,लेकिन इस विशेष दिवस पर जब माउंटेन मैन दशरथ मांझी का जिक्र आता है तो प्यार में संघर्ष जुनून और पागलपन भी दिखता है। बिहार में गया के करीब गहलौर गांव में दशरथ मांझी के माउंटन मैन बनने का सफर उनकी पत्नी का ज़िक्र किए बिना अधूरा है। गहलौर और अस्पताल के बीच खड़े जिद्दी पहाड़ की वजह से साल 1959 में उनकी बीवी फाल्गुनी देवी को वक्‍़त पर इलाज नहीं मिल सका और वो चल बसीं। यहीं से शुरू हुआ दशरथ मांझी का इंतकाम। साल 1960 से 1982 के बीच दिन-रात दशरथ मांझी के दिलो-दिमाग में एक ही चीज़ ने कब्ज़ा कर रखा था। पहाड़ से अपनी पत्नी की मौत का बदला लेना। और 22 साल जारी रहे जुनून ने अपना नतीजा दिखाया और पहाड़ ने मांझी से हार मानकर 360 फुट लंबा, 25 फुट गहरा और 30 फुट चौड़ा रास्ता दे दिया। दशरथ मांझी के गहलौर पहाड़ का सीना चीरने से गया के अतरी और वज़ीरगंज ब्लॉक का फासला 80 किलोमीटर से घटकर 13 किलोमीटर रह गया। साल 2007 में जब 73 बरस की उम्र में वो जब दुनिया छोड़ गए, तो पीछे रह गई पहाड़ पर लिखी उनकी वो कहानी, जो आने वाली कई पीढ़ियों को सबक सिखाती रहेगी।

अजय झा

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