जानिए फिल्म सुपर 30 के रील और रियल हीरो को

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पटना में सुपर 30 कोचिंग चलाने वाले प्रो. आनंद कुमार की जिंदगी पर आधारित फिल्म सुपर 30 शुक्रवार को रिलीज हो गई है। सुपर 30 की शुरूआत होती है फ्लैशबैक के साथ। एक बेहतरीन स्टूडेंट आनंद कुमार का एडमिशन क्रैबिंज यूनिवर्सिटी में होता है, लेकिन आर्थिक स्थिति खराब होने के चलते वो दाखिला नहीं ले पाता है। आनंद के पिता की मौत हो जाती है और उसे अपनी मां के हाथों बने पापड़ बेचकर घर चलाना पड़ता है। हालांकि आनंद की किस्मत बदलती है जब उन्हें लल्लन सिंह का साथ मिलता है।लल्लन आईआईटी की तैयारी कर रहे बच्चों के लिए एक कोचिंग सेंटर चलाता है और आनंद को बतौर टीचर शामिल कर लेता है। हालांकि जब आनंद को एहसास होता है कि उसके जैसे कई बच्चे अपने सपनों का आर्थिक तंगी के चलते बलिदान कर रहे हैं तो वो अपनी कंफर्टेबल जिंदगी को छोड़कर फ्री कोचिंग सेंटर खोलता है। ऋतिक रोशन ने आनंद कुमार लगने की कोशिश की है। ऋतिक का बिहारी एक्सेंट सुनने में दिलचस्प है और वे इस रोल को निभा पाने में काफी सफल रहते हैं। ऋतिक का काम बढ़िया है,और रोल के लिए उनकी मेहनत दिखती भी है। फैंस ऋतिक रोशन की परफॉर्मेंस और फिल्म के इमोशनल सीन्स की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं। लगभग 2.5 साल के बाद ऋतिक रोशन ने बड़े पर्दे पर वापसी की और फैंस को वो दिया जिसका उन्हें बेसब्री से इंतजार था। आनंद कुमार के नेतृत्व में सुपर 30 ने देश भर में कमाल किया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि 2 घंटे 42 मिनट की ये फिल्म विकास बहल के नेतृत्व में कितना कमाल दिखा पाती है और कितने कड़ोर का बिज़नेस कर पाती है।

वहीं आनंद कुमार की बात करें तो बहुत कम लोगों को पता होगा की सुपर 30 के रियल हीरो आनंद कुमार ब्रेन ट्यूमर से ज़िन्दगी की जंग लड़ रहे हैं। आनंद ने खुद इस बात का खुलासा किया है। यही वजह है कि कम उम्र में ही उनपर बायोपिक बनी है। अपनी बायोपिक की रिलीज़ से पहले हुए एक इंटरव्यू में भावुक होकर आनंद कुमार ने बताया कि कैसे वह ज़िंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं…आनंद कुमार ने बताया कि वो इस बात के लिए खुद को खुशकिस्मत मानते हैं कि वो जीवित रहते हुए अपनी जीवन यात्रा को पर्दे पर देख पाए। एक इंटरव्यू में आनंद कुमार ने बताया कि वर्ष 2014 में दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में अपना इलाज करवाते समय पता चला कि उन्हें ब्रेन ट्यूमर है। डॉक्टरों ने आनंद कुमार को बताया कि उनके हर ऑपरेशन के साथ उनपर खतरा और बढ़ता जा रहा है। ट्यूमर का असर उनकी अन्य इन्द्रियों पर भी हो सकता है। आनंद कुमार ने बताया कि कैसे 2014 के बैच के उनके छात्रों को उनकी इस बीमारी क बारे में पता था लेकिन वो लगातार काम करते आनंद कुमार एक जाने-माने शिक्षक हैं। वो आईआईटी-जेईई के इंट्रेंस के लिए छात्रों को तैयारी कराते हैं। उन्होंने एक शिक्षक के रूप में कई लोगों के भविष्य को बदलने का काम किया है। उनके इस काम के लिए वर्ष 2010 में टाइम पत्रिका ने द बेस्ट ऑफ एशिया’ लिस्ट में शामिल कर सम्मानित किया है। बहरहाल भारत में बेहतर ज़िंदगी पाने के लिए शिक्षा ही एक माध्यम है और ये माध्यम कुछ ही लोगों को उपलब्ध है और इस बात पर ये फिल्म सवाल भी उठाती है। इसलिए ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए।

अजय झा

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