जलियांवाला बाग की 100 वीं बरसी

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13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग़ नरसंहार का शताब्दी वर्ष है। फिर याद आई वो शहादत जिसकी इबारत खून से लिखी है। सौ साल पहले जब बहा हजारों हिन्दुस्तानियों का खून। जब बिखरी पड़ी थी आज़ादी के परवानों की सैकड़ों लाशें। सौ साल बाद ब्रिटेन ने भी माना शर्मसार करने वाली थी वो घटना। ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने कहा उस दिन जो कुछ हुआ उसका ब्रिटेन को है खेद। 1997 में महारानी एलिज़ाबेथ ने इस स्मारक पर मृतकों को श्रद्धांजलि दी थी। वहीं ब्रिटेन की महारानी ने इसे इतिहास का दुखद अध्याय बताया था। गौर करनेवाली बात ये है कि इतना सबकुछ होने के बावजूद भी ब्रिटेन ने नहीं मांगी माफ़ी।

जानिये जलियांवाला बाग हत्याकांड
एक तरफ ये अगर शौर्य और अमर वलिदान की कहानी है, तो दूसरी तरफ जुल्म हैवानियत की दास्तान भी। अंग्रेजों पर लगा ये वो खूनी दाग है जो कभी मिट नहीं सकता। क्योंकि कुछ दाग इतने आसानी से नहीं धुलते। कुछ जख्म ऐसे हैं जो कभी नहीं भरते और इस जख्म का नाम है जलियांवाला बाग़। आज़ादी के मतवाले महात्मा गाँधी के आवाहन पर पुरे देश में रॉलेक्ट एक्ट का विरोध कर रहे थे और पंजाब भी इससे अछूता नहीं था। 6 अप्रैल 1919 को अमृतसर में एक सभा हुई। जिससे बौखला कर पंजाब के ब्रिटिश हुकूमत ने आज़ादी के आंदोलन के दो बड़े नेताओं डॉक्टर सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर लिया। जिसके बाद अमृतसर में लोगों का आक्रोश फुट पड़ा। फिर आई वो तारीख जिसको हिंदुस्तान के इतिहास में कभी नहीं मिटाया जा सकता है। 13 अप्रैल 1919 की वो बैसाखी का दिन अपने नेताओं के गिरफ्तारी के विरोध में अमृतसर के जलियांवाला बाग़ में करीब 15 से बीस हज़ार हिंदुस्तानी इकट्ठा थे। ये सब देखकर ब्रिटिश हुकूमत घबरा गई। पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओ डायर के हुक्म पर जनरल रिगनॉल्ड डायर अपनी टुकड़ी के साथ पहले ही अमृतसर पहुँच चूका था। उसे बस इंतज़ार था ओ के हुक्म का आखिरकार उसे हुक्म मिल ही गया। माइकल ओ डायर ने जनरल रिगनॉल्ड डायर को सन्देश दिया कि हिन्दुस्तानियों को ऐसा सबक सिखाओ की उसे कभी न भूल पाये। डायर के सैनिकों ने जलियांवाला बाग में हो रहे सभा को चरों तरफ से घेर लिया। उसके बाद जनरल डायर के सिर्फ एक शब्द फायर से गोलियों की तड़तड़ाहट ने वहां सैकड़ों लाशें बिछा दी।कहते हैं कि 120 लाशें तो सिर्फ उस कुएं से बाहर निकाली गई थी जिस कुएं में लोग जान बचाने के लिए कूदे थे। कहा जाता है कि करीब दस मिनट में 1650 राउंड गोलियां चलाने के बाद जनरल डायर इसलिए रुक गया था क्योंकि उसके सैनिकों की गोलियां खत्म हो गई थीं। अंग्रेजों के आंकड़े बताते हैं कि जलियांवाला बाग कांड में 379 लोग मारे गए थे। जबकि हकीकत ये है कि उस दिन एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे और करीब दो हजार गोलियों से जख्मी हुए थे। घटना के बाद जनरल डायर को निलंबित कर दिया गया। वह वापस ब्रिटेन लौट आया। यहां सरदार ऊधम सिंह ने 13 मार्च 1940 के दिन जनरल डायर हत्या की। ऊधम सिंह को 31 जुलाई 1940 को फांसी पर चढ़ा दिया गया।

अजय झा

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