एनडीए और महागठबंधन को बिहार में जाति के सहारे जीत की उम्मीद

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बिहार में जातिगत राजनीति हमेशा से हावी रही है इसलिए सभी पार्टियों ने जातिगत आधार पर उम्मीदवारों को टिकट दिया है। इसमें सबसे बड़ा नुकसान सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों का हुआ है क्योंकि महागठबंधन ने कुल नौ और एनडीए ने कुल 13 ही सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों को चुनाव मैदान उतरा है। बिहार में अति पिछड़ा वर्ग की कुल जनसंख्या का 30 फीसदी है। इसे ध्यान में रखककर महागठबंधन ने पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ा वर्ग के कुल 18 उम्मीदवारों को टिकट दिया है। वही इन 18 सीटों में भी 10 उम्मीदवार यादव जाति के हैं बाकी के चार अति पिछड़ा वर्ग और चार कोयरी (कुश्वाहा) जाति के हैं। माई समीकरण के फार्मूला को अपनाते हुए आरजेडी और कांग्रेस ने छह उम्मीदवारों को टिकट दिया है। महागठबंधन ने जो नौ सीटें उच्च जाति के उम्मीदवारो को दी हैं उनमें भी पांच सीटें राजपूत, दो भूमिहार और एक सीट ब्राह्मण और एक कायस्थ को दिया है। वहीं एनडीए ने पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग से 19 उम्मीदवारों को टिकट दिया है इनमें यादव उम्मीदवारों की संख्या पांच है। लेकिन बीजेपी की नज़र मुख्य रूप से अति पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को लुभाने की है। हालाँकि उपेंद्र कुश्वाहा कोशिश कर रहे हैं कि बिहार में वह अपने आपको अकेले कोयरी नेता के रूप में स्थापित कर सकें। बिहार में कोयरी की संख्या 5 से 6 फीसदी है। जेडीयू ने कोयरी समीकरण को मात देने के लिए तीन टिकट कोयरी जाति के उम्मीदवार को मैदान में उतरा है। इसके अलावा जेडीयू ने दो कुर्मी उम्मीदवार और एक कायस्थ जाति के उम्मीदवार को टिकट दिया है। इसी तरह से एससीएसटी जाति के वोटों को अपनी तरफ खींचने के लिए महागठबंधन ने छह रिज़र्व सीट में से चार पर चमार जाति के उम्मीदवार को उतारा है क्योंकि इनकी काफी संख्या है। जबकि एनडीए ने चार उम्मीदवार पासवान एक चमार और एक मुसहर जाति से उतारे है।
आपको बता दें कि जैसे जैसे लोकसभा चुनाव नज़दीक आ रहा है वैसे-वैसे महागठबंधन और एनडीए अन्य पिछड़ा वर्ग व एससीएसटी वर्ग के मतदाताओं को लुभाने के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं। इसीलिए दोनों ने मंडल पॉलिटिक्स को एक बार फिर से पिटारे से बाहर निकाल लिया है। आरजेडी ने इसलिए सिर्फ राजपूत को ही टिकट दिया क्योंकि भूमिहार, ब्राह्मण और कायस्थ मंडल कमीशन के समय से ही आरजेडी के विरोधी हैं। इसके अलावा सामान्य वर्ग के रिज़र्वेशन का विरोध करने के कारण भी आरजेडी से गुस्से में है। 2009 में एनडीए की जीत के बाद बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा था कि बिहार जातिगत आधारों से ऊपर उठकर विकास आधारित वोट कर रहा है। हलाकि मुख्यमंत्री के ये दावे पूरी तरह से फेल ही साबित होते दिख रहे है। लेकिन जो आज की स्थिति दिख रही है उससे लग रहा है कि बिहार की राजनीति में जाति एक बड़ी भूमिका निभाता है।

अजय झा

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